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Saturday, January 30, 2010

अवधी उपन्यास- क़ासिद (14)

सांझ घिरि आई। थोरेहे द्यार म आसमान म नखतौ चमकन लाग। नौकर चाकर लोग अपने अपने काम म व्यस्त हुइगै और शुक्लाजी टीवी खोलि क बैठि है टीवी द्याखन। आजु दुई तीन दिनि बादि बत्ती आई है। फत्त्तेपुर चौरासी जैसे गांवन म बिजली आवबु कौन्यो त्यौहार ते कम नाई है। पहले तो बत्ती खूब आवा करति रहै, लेकिन पिछले चुनाव म इलाके क विधायक हुइगै समाजवादी पार्टी क्यार और सूबे म सरकार बनिगै बहुजन समाज पार्टी केरि। बस तबहि ते फत्तेपुर मा बिजली बरसात कि नाईं भगवान भरोसे हुइगै।

डिशटीवी केरि जब सुरुआत भै तो शुक्लाजी के घर मा जिले क्यार पहला डिशटीवी लाग रहै। समाचार चलत होएं तो शुक्लाजी की अम्मौ आ जाती है टीवी द्याखन। टीवी परिहां समाचार चलि रहे। शुक्लाजी और उनकी अम्मा दोनों जने याक याक कुर्सी पर बैठि क समाचार देखि रहे। एत्तैहेम टिल्लू हु कमरा म घुसे। देखिन क सबक्यार ध्यान टीवी तन लाग है तो येऊ टीवी द्याखन लाग।

शुक्लाजी के घर ते थोरिहु दूर अमीर हसन क टालौ पर हलचल है। हुअन बिजली क खंभा त कटिया डारि क जलावा गा बल्ब चमकि रहा है। रेडिया पर समाचार आ रहे अउर चार पांच बुजुर्ग मनई बैठि क समाचार सुनि रहे। सब मनई चुपै बैठि है। एत्तेह म बत्ती चली गै। याके बुजुर्ग के मुंह ते तुरंते निकरा –

या अल्लाह, अबकी दांय जानौ ईद पर फत्तेपुर मा रौनक नाई रही।

चहुं गिरदा अंधेर हुइगा तो अमीर हसन रेडियो बंद कई दीन्हेनि।

रात बहुत हुइगै मियां। चलो भीतर चला जाए। बत्ती क्यार जित्ती द्यार क्यार दरसन बदे रहैं, उइ हुइगे। अब बत्ती नाई आई।

दूसरके बुजुर्ग अपन जज्बात रोकि नाई पाए।

अबै द्याखौ जन्माष्टमी पर पूरा रात बत्ती रहै, लेकिन रमज़ान हैं तो बत्ती क कहूं पता नाईं। चुनाव अइहैं तो आ जइहैं नेता लोग, वोट मांगै और कहिहैं चौबीसो घंटा बत्ती आइ गांवन मा। ई फत्तेपुर क्यार नसीब कब बदलिहैं, पता नाईं।

अमीर हसन त रहा नाई गा, उई गला खंखारि क बोले, चच्चा, नेता लोगनै त किस्मत बदलि जातै तो आजु हम पंचै यू दिन नाईं देखि रहे होइत।

कोलिया क उई छ्वार आयशा खिड़की तीर ठाढ़े अमीर हसन क टाल प बैठे लोगन केरी बातें सुनि रहीं। एत्ते म भीतर त उनकी अम्मा आवाज़ लगाएनि, अरे कहां हौ बिटिया......

आयशा तुरतै अपन ध्यान खिड़की त हटाएन और तख्त पर बिछौना बिछावति भै जवाब दीन्हेनि, आ रहिन अम्मीजान.. बस तुम्हार बिस्तर लगा रही रहन..

आयशा की अम्मा तेहि ले धीरे धीरे लकड़ी केरे सहारे अउर दीवार टटोलति भै हुअन लगे आ गईं। आयशा बिछौना बिछा ईं तो अम्मा ह्वानै पौढ़ि रहीं। आयशा नेरेहे याक खटिया पर लुढ़कि गईं। तनिक द्यार क चुप्पी क बाद आयशा क अम्मा बोलीं, बच्चा सबेरे अब्बा क खत लिख दीन्ह्यौ। और कल्लि ही स्पीड पोस्ट म डारि आएओ। अब्बा अबै लगे पैसा नाईं पठैएन। औ यहौ लिखि दीन्ह्यौ कि अब तौ गांवौं म दूध वाले और रिक्शावालेन तीर लगे मोबाइल हुइगै हैं। हुइ सकै तो एकु मोबाइल तुम्हरै हो खातिर भेजि दें। कब लगे दूसरेक घर जाक फोन सुना जाए। पीसीओह एत्ति दूरि है।

आयशा हूं हां करति रहीं। उनके मन मा तो यहै बात घूमि रही कि का गांवन म बत्ती हु क्यार मजहब क नाम प बंटावारा हुइगा है। कि कौने त्यौहार पर कौने गांव म रौनक रही अउर कौने गांव म अंधेरा।

वइसी आयशा क अम्मा धीरे धीरे बुदबुदा रहीं।

जवान बिटिया कब लगे गांव क चक्कर काटी। जल्दी त अपने घरै जाएं तो हमारि जिम्मेदारी पूरि होए।

का कह्यौ अम्मा?“ आयशा एकदम त चौंकि क बोलीं।

आयशा की अम्मा क चेहरा पर बिटिया त सरारत करै कि मुस्कान तैरि गै, कुछौ नाईं कुछौ नाई। अरे याहै पूछिति आए कि का इमरान क कौनौ खत आवा रहै का आजु?”

इमरान का नाम सुनतै आयशा सरमा गईं। अपने दुपट्टा म अपन मुहं छुपा लीन्हेनि। अम्मा उठि बैठीं तो आयशौ खटिया म उठि बैठि अउर अपन सिर अम्मा कि गोदी म धरि दीन्हेनि। बिटिया क सिर सहलावति भै अम्मा बोलीं, अरे तुम नसीब वाली हौ बिटिया। अब्बा तुम्हरे खातिर कित्ता मेहनती औ कित्ता सुंदर शौहर तलाशेनि है। उ तौ तुमका खतौ लिखन लाग है। मतलब कि हमरी बिटिया क अबहीं त चाहन लाग है।

अम्मा.....आयशा फिर ते शरमा गईं। लेकिन फूटे दीदन क अपनी बिटिया कि या लाज लाली भला कहां दिखाए। या किस्मत तौ कौनौ कौनौ महतारी ह क मिलति है। अम्मा बस मुस्कुरा क करवट बदलि लीन्हेनि। आयशा अब ना जानै का स्वाचन लागीं...।

(जारी...)

Friday, January 15, 2010

अवधी उपन्यास- क़ासिद (13)

शुक्लाजी अपने लरिका पर अपनी अम्मा क पानी छिड़कत देखेन त पानी केरि बूंदन त जइसे उन क्यार अतीत टपकन लाग। वा सामौ अइसिहि रहै। शुक्लाजी केरि छत पर तेरे तमाम टोली आवति दिखाई दे रही रहैं। जेत्ते लोग इ टोलिन म सामिल रहैं सब कि जबान पर याकै बात- जय श्री राम, जय श्री राम।

गांव क बाहर मंदिर त निकरी इ टोलिन म कम ते कम सौ डेढ़ सौ लोग रहैं। चहतीं तो इ लोग हिंदुआने की तरफ तेरे गांव में प्रवेस कइ सकत रहैं लेकिन इरादा पूजा क कम और दूसर जादा रहै। सब टोली मुसलमानी बस्तिन की तरफ रुख कइ लीन्हेनि। टोलिन केरे आगे चलै वाले लोग कमंडलन तेरे पानी की बूंदे आसपास गुजर रहे लोगन पर छिड़कति जा रहे।

मुसलमानी बस्ती तेरे टोली निकरीं तो मेहरिया अपने अपने लरिकन बच्चवन क घरन पर घसीटन लागीं। मुसलमानन क्यार किवाड़ खटाक खटाक बंद हुई रहै। याक आधी मजबूत दिल केरि मुसलमान मेहरिया किवाड़न की सांस त या फिर खिड़किन केरि दरार तेरे झांकि रहीं हैं। तबहिनै याक टोली शुक्लाजी की हवेली क सामने रुकि गै। इ छ्वार त हिंदुआने म घुसतै सबते पहिला घर शुक्लाजी क्यारै परति है। टोलिन म शामिल लोग और जोर जोर चिल्लान लाग – जय श्री राम, जय श्री राम।

सगरी टोली धीरे धीरे याक के पाछै याक शुक्लाजी की हवेली क समहै रुकन लागीं। पाछे अमीर हसन के टाल पर अब मुसलमानन केरि भीड़ लागन लागि है। लेकिन सब के सब मनई अहैं याकौ मेहरिया या लरिकवा नाईं। अमीर हसन टुकुर टुकुर शुक्लाजी की हवेली तन ताकि रहे। नेरेहे आयशा क अब्बा खान साहबौ ठाढ़ है।

शुक्ला जी धोती और कुर्ता पहिने घर ते निकरे। टोली क अगुआई कर रहे पांडे जी कमंडल त पानी लइके शुक्लाजी पर छिड़कन लाग। पाछे त निकरि कि दादी हू समहे आईं। दादी आचमन कीन्हेनि। थारी पर धरी शिलाएं पूजेन। धोती क खूंटे त निकारी क रुपया दीन्हेनि। एत्तेम टिल्लू हवेली त निकरि क बाहेर आगे। इ दादी क धोती पकरे नेरेहे ठाढ़ हैं। पांडेजी टिल्लू क देखि क मुस्करान। थारी त रोली लइके टिल्लू के माथे पर तिलक लगा दीन्हेनि। टिल्लू एत्ति भीड़ देखि क कुछ समझि नाई पाए। तिलक लगावा गा तो इ अपने पिताजी केरे नेरे ठाढ़ हुइगै। पाछे वाली टोली क्यार लोग दादी, शुक्लाजी और टिल्लू केरे ऊपर पानी छरकि रहे।

टिल्लू अइसिहि भीड़ थोरे दिन पहिले अमीर हसन क दुआरे दीखि तेइन। तब जानौ सुट्टू क अब्बा हज करै जा रहे रहै। समझिम तबहूं टिल्लू क जादा कुछ नाई आवा रहे। उनका बस यादि है तो एत्ता कि उन दिन सुट्टू गाना गा रहे रहै - मदीने वाले को मेरा सलाम कहना, मदीने वाले को...। सब टोली आगे निकरि गईं। दादी और शुक्लाजी हवेली क अंदर चले गे। टिल्लू देखेनि कि अमीर हसन के टाल पर लागि भीड़ अबहूं कम नाई परी है। टिल्लू का पता नाईं का एहसास भा इ गावन लाग - मदीने वाले को मेरा सलाम कहना, मदीने वाले को...।

अमीर हसन धम ते याक कुर्सी पर बैठि गै। और द्यार तक हिंदुआने तन जाती टोलिन कइहां द्याखति रहे। टोलिन म सामिल लोग अब्यौ कोलियन म पानी छिरकति जा रहे। जय श्री राम क नारा अब सुनाई तो परि रहे हैं लेकिन इन केरि आवाज अब कम परन लागि है।

तबहिनै हवेली क गेट खुला। शुक्लाजी एकदम त सनाका भै। खोपड़ि क झटका दीन्हेनि। और अबहिं अबहिं जौन कुछ उ सोचि रहे रहैं, वहिके मारे फिर ते याक दाय मैदान कि तरफ देखेनि। लेकिन हुआं तो अब कौनो नाई है। थोरी देर पहिले तक खेलि रहे रहै लरिकवऔ अब हुअन नाई हैं। शुक्लाजी हवेली क गेट तन देखेन। दादी हवेली म दाखिल हुई रही अहै। पाछे पाछे टिल्लू चले आ रहे। कमीज क आस्तीन त अपन मुंह पोंछि रहे, जानौ अपने ऊपर छिड़की गईं पानी क बूंदे साफ कर रहे। शुक्लाजी स्वाचन लाग उई पानी केरि बूंदन क बारे म जौनी शिला पूजन क बखत उन पर छिड़की गई रहैं – का फत्तेपुर चौरासी केरि गंगा जमुनी तहजीब पर उइ पानी की बूंदे तेजाब बनि कै गिरी रहैं?

(जारी....)

Tuesday, January 12, 2010

अवधी उपन्यास- क़ासिद (12)

कुबेरि बेरिया गांवन म वौ बखत होति है जब घरन के बाहर गोरु हरहा पहुंचन लागति हैं। जिनके घर मा लालटेन है उई लालटेन क सीसा साफ करैम औ मिट्टी का तेल चेक करन लागत हैं औ जिनके घर मां कुप्पी है उ अपनि अपनि कुप्पिन केरि बाती क्यार ल्यांड़ा झरिहा क कुप्पी जला देति हैं। येई बेरिया जादातर घरन म चूल्हा जलन लागत हैं जिन क्यार धुंआ गांव केरि कोलियन म महकनौ लागत है और आंखिन म करुवानौ लागत है। लोग अपने घरन तन चल परि हैं, लेकिन टिल्लू गांव क याक छ्वार पर बने मैदान याक बेरवा क तरे बैठ हैं। उन क्यार साथी संगी खेलि रहे लेकिन टिल्लू दूसरी छ्वार मुंह कीन्हे बैठि हैं। उनका अइसे बैठे द्यार हुइगै तौ लरिकवा टिल्लू के नेरे आ गे।

अरे अइसे नई दुल्हिनि कि नांय मूं छुपाए काहै बैठ हौ टिल्लू?”

लरिकवा आक टिल्लू तेरे चुहल करन लाग। याक लरिकवा क ऊ गाना याद आवन लाग जेहिके बारे में लोग कहत है कि यू गायक के एल सहगल कि नांय नाक ते गावति है। ऊ अपन सुर साधेसि।

झलक दिखला जा...

टिल्लू धीरे त पलटे औ तब सब लरिकन क जानि परा कि काहे टिल्लू उनकी तन पीठि कीन्हे बैठ रहैं। उनके हाथ म याक अखबार म लिपटे दुई खजूर लरिकवन क दिखाई परे। जेहिमत याक खजूर टिल्लू मुंह म धरेन और दूसरि कसि क हाथे म पकरि लीन्हेनि।

अरे कुछौ नाईं भाईजान। बस खजूर खा रहे रहन।

लरिकवन क मुंह ते लार असि टपकनि लाग। लेकिन अब याक खजूर क मारे को दंगा करै। सबते बड़ा लरिकवा बस एत्तै कहि पावा, भाइन ते दगा? अकेले अकेले खजूर?” कहे क साथे यू लरिकवा टिल्लू क हाथे ते कागज और खजूर क पन्नी लइकै अइसी वइसी पलटन लाग। तबहिनै वहिका पन्नी पर कुछ छपा भा समझि म आवा।

हूं...पैक्ड इन दुबई..बचुआ तुम्हरे घर ते तो कौनौ दुबई गा नाईं, फिर इ खजूर?”

टिल्लू क चेहरा एकदम त बदलि गा। इनका लाग कि चोरी पकरि गै। लेकिन, साथी संगिन त कौनु डर औ इनते का छिपावै क। टिल्लू साफ साफ बता दीन्हेनि।

अरे आयशा दीन्ह हइन।

टिल्लू क मुंह त आयशा का नांव क निकरा जैसै कौनौ बम फाट होए। सब लरिका याक साथ चिल्लान।

आयशा?”

ओ त्तेरे की.? तुम्हारि दोस्ती हुइगै वहितै? औ हम पंचन क कानों कान सूंघ तक नाई मिलीं। अरे वह तौ हूर परी है!!”

टिल्लू मुस्कान। उनका लाग कि बाजी अबै उनके हाथे त निकली नाई है। लरिकवा जौने जोश त आयशा का नाम सुनिकै पगलान वहितै टिल्लू क मन का बड़ा खुसी भै। उनका लाग जैसे उइ जगु जीति लीन्हेनि औ इस सब लरिकवा सार इन तो मीलन पीछे रहिगै। टिल्लू याक औरि सुरसुरी छोड़ेन।

का नाचति है आयशा...”.

अबकि कौन्यो लरिका केरे गरे त आवाज नाई निकरी। सब सनाका। सब याक दूसरे क मुंह ताकि रहे। सबके मन मा बस यहै बात कि पंडितन क्यार यू लरिकवा तो बहुतै तेज निखरा। यकीन तो सबका हुइगा कि टिल्लू जौनि बात कहि रहे वा सोलहौ आना सही है। लेकिन तबहूं...

कसम ति….” एकु लरिकवा क मन मा तस्दीक करै क इच्छा जागि परी।

टिल्लू तुरतै कसम खा लीन्हेनि। सांच क कौनि आंच।

फिर दूसर सवाल।

तुम कब देख्यौ।

अरे भइया। हमरी छति ते दिखाई परति है। आय़शा रोज़ सबेरे रियाज़ करती हैं और हमरी छत ते उन क्यार आंगन साफ दिखाई परति है।

सब लरिकवन क अबकी सच्ची म लाग कि टिल्लू जगु जीति लीन्हेनि औ इ पंचे बस गिल्ली डंडै ख्यालति रहिगै। सब याक दूसरे क हारे भै योद्धान कि नाई देखि रहै। सुट्टू क चेहरा तो ऐसे उतरि गा जइसे टिल्लू उन क्यार सब कंचा याके दांव म जीते लीन होएन। मन मसोसि क रहिगै कल्लू, तुम्हारि तो निकरि परी टिल्लू यार। ...अच्छा हमका दिखा सकति हौ आयशा क्यार रियाज़?” सुट्टू अइसे पूछेनि जैसे कहि रहे होए कि भैया पतवार तो तुम्हरे है हाथ म रही अब, बस एहिके पहिले क हम किनारे पर छूटि जाइ, नांव म चढ़ा लेओ।

टिल्लू क मुंह ते निकरहै वाला रहे कि काहे नाई भाईजान तुम्हू आ जाओ कल्हि सबेरे। लेकिन फिर उनका दादी क्यार चेहरा यादि आगा। पांय क अंगूठा त मिट्टी कुरेदति भै बोले, ना भाईजान। आप कइसे देखि पइहौ। आप तौ मुसलमान हौ। औ दादी कबहूं याक मुसलमान क अपनी अटारी पर चढ़ै खातिर हां ना कहिहैं।

सुट्टू बात समझि गै। लेकिन दूसर लरिकवा जौन अब सुट्टू त उमरि म कम हैं, उई पूछि बैठि, यू हिंदू मुस्लिम क झगड़ा का है भाईजान?” सुट्टू क मुंह पहिलेहे त उतरा रहै, यू सवाल सुनि कै ऊई दूसरि घांई द्याखन लाग। टिल्लू क्यारौ चेहरा अबकि उतरि गा कि इ चाहैं तोऊ अपने साथिन क अपनी छति पर नाई लै जा सकत। टिल्लू क लाग कि उनके आंसू निकरि अइहैं, सो उइ उठि कै घर तन चलि दीन्हेनि। सब लरिकवौ पीछे पीछे अपने अपने घरन तन चलि दीन्हेनि। सुट्टू अबै लगे आसमान तन ताकि रहे रहैं एकदम त उनका लाग कि सब लरिकव म उई सबते बड़े हैं तौ उई दौरि क एकदम त टिल्लू क तीर पहुंचे औ उनके कंधा पर हाथ धरि दीन्हेनि।

अरे, तुम काहे परेसान होत है टिल्लू। हम पंचै जब बड़े होब तब यू सब झगड़ा झंझट खतम कर देबे। तब तौ तुम आवै द्याहौ न हमका अपनी छति पर।कहिकै सुट्टू टिल्लू केरि पीठ पर धौल जमाएन। टिल्लू क लाग जइसै उनके करेजे पर ते बोझु उतरि गा होए। उई सुट्टू तेरे हाथ मिलाएन, दून्हू दोस्त गले मिलै लाग। टिल्लू सुट्टू केरे गले लाग तो सामने त दादी मंदिर तन ते आवति दिखाई परीं। हाथे म पूजा की थाली और साड़ी क पल्ला खोपड़ी पर। तबहीं दूर गांव की मस्जिद तेरे अजान की आवाज़ सुनाई परनि लागि...अल्लाहो अकबर अल्ला...हो अकबर।

टिल्लू दौरि क दादी तीर पहुंचे, लेकिन एहिके पहिले टिल्लू दादी तेरे लिपटि पावें, ऊई हाथे त दूर रहै क्यार इशारा करन लागीं। टिल्लू समझि गै कि दादी उनका सुट्टू केरे गले लागत देखि लीन्ह हइन। बेचरेऊ चुप्पै दादी त थोरी दूर पर साथै साथ चलन लाग। दादी पूजा केरे लोटा तेरे जल लीन्हेनि औ टिल्लू पर छिरकन लागीं।

ओम अपवित्रा वा पवित्रो वा सर्वांगतोपि वा।

या स्मरेत पुण्डरीकाक्ष स बाह्याभ्यंतर: शुचि:।।

दादी औ टिल्लू घर तन बढ़ति जा रहे। दूर अपनी छत पर ढाढ़ शुक्लाजी यो सब देखि रहै। उनका बीते दिनन केरि बातैं यादि आवन लगती हैं।

(जारी...)

Sunday, December 20, 2009

अवधी उपन्यास - क़ासिद (11)

दादी चाय क कप लैइके बिल्कुल नेरे आ गईं तबहिनौ शुक्लाजी का पता नाई चला। ऊ पता नाईं टीवी म का देखि क बस मुस्कुरवतै रहे। दादी चाय क कप नेरे याक स्टूल पर धरि दीन्हेनि।

का बात है बच्चा? का देखि क मुस्कुरा रह्यौ?”

शुक्लाजी शायद अबहिनौ अपनी अम्मा केरि बात नाईं सुनेनि। उन क्यार ध्यान बस टेलीविजन क तरफै लाग है। दादी अबकि धीरे त अपने लरिका क्या हाथ पकरेनि औ मुंह ऊपर घाईं कईके बोलीं।

बेटा, हमार मन कहति है कि यू घर बेचिक हिंदुआने म भीतर तन कौनौ दूसर घर लइ लेओ।

शुक्लाजी अबकि एकदम ते चौंके। उई अपनी महतारी तन द्याखन लाग। उनकी अम्मा चाहे कित्तौ मुसलमानन तेरे जरति बुझति रहीं होए लेकिन ऐइस बात ऊई कबहूं नाईं कीन्हेनि। फिर अब का हुइगा?

काहे, अम्मा? का भा? इ घर मा का खराबी है?”

दादी क मन म अब लगै जौन कुछ भीतरै भीतर चलि रहा रहै। अपने लरिका क सवाल सुनिकै बाहर आवन लाग।

तुम नाई समझिहौ। आजु काल्हि गांव क हवा कुछु ठीक नाईं है। अमीर हसन केरे टाल पर ना जाने कहां कहां क्यार मौलवी आक डेरा जमावन लाग है। पता नाईं का का साजिशै रची जा रही हैं आजु काल्हि अमीर हसन क टाल पर। औ टिल्लू क द्याखौ, येऊ ना जाने कहां कहां त औ का का सीखन लाग हैं।

घर मा टीवी- किताबैं अऊर स्कूल म पढाई म खोए रहै वाले शुक्लाजी का लाग मामला संगीन है। ऊई खट्ट त टीवी ऑफ कई दीन्हेनि औ अपनी अम्मा क्यार हाथु पकरि क अपने नेरे बिठा लीन्हेनि। कहां तौ महतारी अबै लगै लरिकवा क समझावा करतीं रहैं, अब बदलति बयार का बहाव द्याखौ। लरिका क अम्मा क्यार मन टट्वालै क परा।

अम्मा, मन चंगा तो कठौती में गंगा। तुम काहे परेसान हुई रह्यू। कुछु नाईं होई, औ अमीर हसन भला हम लोगन क्यार नुकसान काहे चइहैं?”

दादी कइहां शायद दिन भर घर मा नाऊन दाई औ कल्लू के रहत्यौ सूनापन सतावन लागन लाग है। दादी अपने पिछलै दिनन की बात यादि कइकै गुमसुम होन लागीं, पता नाईं काहे लेकिन अकेले म अब हमार जी घबरान लाग है। इ लोगन क कौनौ भरोसा नाईं। द्याखत नाईं हौ रोजु त कहूं न कहूं बम धमाकन केरि खबरै टीवी पर आवा करती हैं।

अम्मा, धमाका सहरन म होति हैं। हम लोगन का? हियन कौन भीड़ भड़क्का होति है, औ हियन तो कौनौ ऐसि इमारतौ नाईं कि आतंकवादी वहिमा धमाका कइकै दुनिया क कुछु दिखावन चइहैं। हियन तौ अब्यौ राम रहीम औ किसन करीम साथै साथ काम करति हैं।शुक्लाजी ऐसे ब्लावनग लाग जइसे अपनी अम्मा का न बल्किनु अपने लरिकवा क समझा रहे होएं।

अम्मा। या पुरखन क ज़मीन अहै। एहिका छोड़ि क हम लोग कहां जइबे। औ धर्म का है, या बात क अब हमका तुमका बतावैक परी। धर्म क्यार मतलब तो तुम हमका बचपनै त सिखावा हऊ। यू हिंदु मुसलमान क्यार झगड़ा तो उन लोगन क्यार है जिनका पतै नाईं कि धर्म होति का है? तुम ऐसै काहे स्वाचन लागी हौ?”

अब दादी का बतावैं कि उनका सबसे ज्यादा फिकर टिल्लू केरि होनि लागि है। बुढ़ापा म वइसेहो वहि ताना लरिकवा छांड़ि क पोता पियार हुई जाति है जइसै बनिया क असल छांडि क सूद। उई पता नाईं का स्वाचन लागीं। शुक्लाजी अम्मा क समझा क फिर ते टीवी ऑन कीन्हेनि। चैनल बदलति बदलति न्यूज़ चैनल पर आए तो उन केरि अंगुरि जइसे रिमोट पर अपने आप रुकि गईं। टीवी पर मुंबई बम धमाकन म तीन लोगन क फांसी क सजा सुनाए जाएक खबरि आ रही।

टीवी पर एंकर खबर पढ़ि रही।

मुंबई बम धमाकों के मामले में मकोका की विशेष अदालत ने आज तीन दोषियों को फांसी की सजा सुना दी। इनमें एक महिला भी शामिल है। फांसी की सज़ा पाने वालों के नाम हैं...अजमल...

इ चैनल पर शुक्लाजी रुकि तो गे, लेकिन एकदमै त उनका यादि आवा कि थोरी देर पहिला का बात चलि रही रहै। ऊ तुरतै टीवी ऑफ कई दीन्हेनि। पलटि क अपनी अम्मा तन देखेन, अम्मा अबकी गौर त शुक्लाजी तन निहारि क द्याखन लागीं। शुक्लाजी अम्मा केरि आंखिन क्यार सवाल पढ़ि तौ लीन्हेनि, लेकिन शायद इन क्यार उत्तर उनके तीर न रहैं। ऊई अपना मुंह दूसरी तन घुमा क द्याखन लाग। दादी समझि गईं कि लरिकवा अब इ मुद्दा पर बात करैक मूड म नाईं है। ऊई उठीं औ नाऊन दाई त पूजा क थाली लावै क कहिकै भगवानेन केरे कमरा म चली गईं। जात जात एत्तै कहेन, टिल्लू क आवाज़ दइ देओ। कुबेरि बेरिया हुइगै अब वहिका घरै बुला लेओ।

(जारी...)

Thursday, December 17, 2009

अवधी उपन्यास - क़ासिद (10)

आयशा याक दाएं सोचेन कि यू लरिकवा जौनि बात कहि रहा है, वइहमा एहि क्यार मतलबु का है। बतइहौ तो नाईं... आयशा तनिक द्यार कइहां हिचकिचानि कि कहूं याक बाह्मन केरे लरिका साथै बातै करेम कौनौ बतंगड़ ना बनि जाए। फिर ना जानै का सोचिक, ऊई अपन हाथु आगे बढ़ा दीन्हेनि।

हमते दोस्ती करिहौ?

आयशा क्यार नरम नरम मुलायम दूध जइस सफेद हाथि देखि केरे टिल्लू तनुक सकपनान। उनका अपन ग्वार रंग फीका लागन लाग। येउ तनिक द्यार सोच म परिगे। मुसलमानन केरि बिट्यावा। उमरि म दूनी। कहूं दादी देखि लीन्हेनि तौ और मुसीबत। लेकिन फिर ना ना जानै का सोचिक, येउ अपना हाथु आगे बढ़ा दीन्हेनि।

दून्हन क्यार हाथ याक दूसरे ते मिले। आयशा क अच्छा लाग कि चलौ येहि वीराने म कोऊ त अपन मिला। टिल्लू स्वाचन लाग क गांव भरे क लरिका इ बिट्यावा केरि बस बातै हे करत हैं, लेकिन या खुदै हमते दोस्ती क्यार हाथ बढ़ावा हइस। अपनी किस्मत पर टिल्लू इतरावै एहिते पहिलेहे आयशा अपना हाथ वापस खींचेन।

तनिक द्यार ह्यानै रुकौ। आयशा एत्ता कहिके वापस मुड़ीं औ दौरत भै घरै चली गईं। टिल्लू अबै लगे दुआरेहे ठाढ़ हैं। समहे टाल परिहा तमाम मनई लकड़ी खरीदि रहे। टिल्लू उई छ्वार कइहां अपनि पीठ कई लीन्हेनि कि कौनौ ऐसी देखिबौ करै तो पहिचान न पावै। लेकिन, टाल मालिक टिल्लू क तड़ि ही लीन्हेनि। लेकिन कहेनि कुछु नाईं, तनिक द्यार तक उई टाल तन पीठी कीन्हे ठाढ़ लरिकवा क द्याखत रहे, फिर वापस चले गे अपनी गद्दी तन।

टिल्लू क लाग कि आयशा लागत है लौटि क ना अइहैं। उइ अपनि गदोरिया सहलावन लाग, येहि गदोरिया तेरे तो टिल्लू आयशा क पहली दांय छुआ हइन। लेकिन तेहिलिहे आयशा दौरतै फिर लौटीं, इ लेओ छोटे मियां। खजूर। बहुतै मीठी है। बिल्कुल तुमरी नायं। अब्बा दुबई तेरे पठई तेनि।

पिताजी कहि रहे रहैं कि आपकेरि सादी तय हुइहै है।टिल्लू तेरे जानौ आयशा कइहां इ बात केरि उम्मीद ना रहै। उइ मनहिं मन मा स्वाचै लागि कि यू लरिका त हमरे बारे म बहुत कुछु जानति है। फिरौ उनइ जानब चाहेनि, तुमका को बताएसि?”

टिल्लू कुछ नाइ बोले। बस याक खजूर निकारि क मुंह मा धरेन। जइसे कि बरसन त खजूर खाति रहे होएं, एहि तना सर्र त गूदा खाक गुठली राह पर फेंकेनि औ गावन लाग, लाख छुपाओ छुप ना सकेगा राज़ हो कितना गहरा।

दिल की बात बता देता है असली नकली चेहरा।

आयशा क कुछु समझि म नाई आवा। इ गान क हियन का ?”

तुम ना समझिहौ। काला अक्षर भैंस बराबर?”

आयशा अपन सवाल भूलि क टिल्लू क लरिकईं पर हंसन लागीं। टिल्लू अपन खजूर खात भै चलि दीन्हेनि। तबहीं उन केरि नज़र परी आयशा क दालान म बिरे परे अख़बारन पर। काला अक्षर भैंस बराबर? तै फिर इ अखबार?”

आयशा क लाग कि जइसै उनकी चोरी पकरि लीन्हि गै होए। उइ तुरतै बात बनाएनि, अरे, उ का है.. द द दिन नाई कटति है ना। तो बस फोटो द्याखा करिति हन।आयशा तमाम कोशिश कीन्हेनि कि कइसेओ लरिकवा क्यार ध्यान भटकि जाए लेकिन टिल्लू केरे चेहरा क्यार भाव नाईं बदले। उइ कबहूं अखबार तन तो कबहूं आयशा क तन द्यखात रहे। हां, हाथे क खजूर जरूर याक क बाद दूसर मुंह मा डारब टिल्लू नाई भूले।

आयशा क जानि परा कि मामला गड़बड़ हुई सकति है। तो उइ टिल्लू केरि पीठ प धक्का दीन्हेनि, जाओ, तुम्हार दोस्त सब इंतज़ार करत हुइहैं। औ कहूं दादी छति पर आ गईं तौ...

दादी क नाम सुनतै टिल्लू खजूर खात खात हुअन तेरे चलि दीन्हेनि। आयशा क चेहरा पर बड़ी देर बादि मुस्कान आ पाई।

सूरज अस्त होएहै वाला है। टिल्लू क घर मा नाउन दाई तख्त प अइसे वइसे फैले अख़बार समेटि रहीं। तख्त पर पूजा केरि याक तैयार थाली धरी है। शुक्लाजी टेलीविजन देखि रहे औ कौनौ बात पर मुस्कुरइहू रहे हैं। दादी हाथे म चाय क कप लीन्हे आईं औ शुक्ला जी केरि घाईं ध्यान त द्याखन लागीं।

(जारी...)

Friday, December 11, 2009

अवधी उपन्यास - क़ासिद (8)

जइसे टिल्लू क पहिलेहे ते पता होए कि अब का होए वाला है। टिल्लू अपन बस्ता दुआरे हे धरि दीन्हेनि हवेली केरे गेट क तीर और ह्वानै ठाढ़ हुइके गाना गावन लाग, ख्वाजा मेरे ख्वाजा..दिल में समा जा, ......अली का दुलारा.., ख्वाजा मेरे ख्वाजा..।लरिकवा केरि आवाज़ म सुर लागत हैं। औ इ गइहू बहुत आराम ते रहे लेकिन इनकेरि आवाज़ भीतर तक दादी क काने पर परि रही। टिल्लू अपन सुर तनिक देर रोकेनि औ झांकि क भीतर द्याखन लाग कि असल म दादी तक उनकेरि आवाज़ पहुचिहु कि नाईं। फिर जानौ संका भै कि आवाज़ भीतर लगे पहुंचि नाई रही तो इनते रहा नाई गा। ज़ोर त हुंकारेनि, दादी, ओ दादी। अरे जल्दी आओ।जइसे कौनौ ड्यूटी कर रहे होएं वइसे फिर ह्वानै ठाढ़ हुइके अपना गाना गावन लाग, ख्वाजा मेरे ख्वाजा...दिल में समा जा..

आवाज़ भीतर लगे पहुंचि चुकी अहै औ अपन असरौ दिखा चुकी अहै। काहे क भीतर त दादी केरे बरबरावै की आवाज़ अब टिल्लू केरे सुरन के साथ संगत करन लागि है, अरे हमहू ह्याने इत्ता बखत काटि लीन। लरिकवन की पलाई पोसाइहू कइ लीनि। लेकिन, पता नाईं यू कलमुहां कहां त पंडितन के घर मा जनम लई लीन्हेनिस। लागति है मुसलमान बनिकेहे मानी। आवाज़ के साथै साथ दादी हवेली ते बाहर निकरीं। उनि के हाथे म तांबे क्यार एकु लोटा है। यू लोटा दादी केवल पूजा पाठ म इस्तेमाल करती है या फिर कहूं कुछ पवित्र करे क होए तो। जाड़े क मौसम और साम क टाइम। कोहरा तनुक तनुक परन लागि है। राह म लोग दुआरे ठाढ़े लरिका क द्याखत निकरि रहे। कौनो मफलर काने तक बांधे है त कौनो हाथ मसलत जाए रहा। एहि टाइम दादी लोटा लइके गेट तक आईं और लोटा क्यार पूरा पानी टिल्लू क ऊपरि डारि दीन्हेनि। साथे म उइ श्लोक पढ़न लागीं, ओम अपवित्रा वा पवित्रा....।टिल्लू क स्वेटर के भीतर पानी गा तो जानौ करंट लाग होए। बेचरऊ जाड़न म कंपकंपा गे। ऐसे लाग जैसे पानी सीधे हड्डिन पर परा होए।

तेहिलेहे टिल्लू के पिताजी यानी शुक्लाजी हवेली म प्रवेस कीन्हेनि, अरे यू का। तुम अब घरै पहुंचे हो औ यू का आजु फिरि। शुक्लाजी की बातन त पता परति है कि टिल्लू और दादी क यू मोर्चा अक्सरै लागा करति है। जइसे टिल्लू केरि मुसलमानन त मोहब्बत कम नाई परति है वइसेहे दादी क्यारि नफरतौ कम नाई हुई पा रही, आजु फिरि इ बदरुद्दीन केरे दरवाजे पर बैठे चिट्ठी लिखति आहीं। कित्ती दांय समझावा इनका कि स्कूल तेरे सीधे घरै आवा करौ, लेकिन सुनतै नाईं। बड़ा गांधी बनैक शौक चर्रावा है इनका।शुक्लाजी टिल्लू क्यार बस्ता उठाएन औ खोपड़ी त लइके कमर तक भीगि चुके टिल्लू केरि बांह पकरेनि। टिल्लू अपने पिताजी की तरफ देखेनि औ बजाय कौनौ माफी या गलती केरे प्रायश्चित केरे सीधे सवाल कई दीन्हेनि, पिताजी, का गांधी जी हू दूसरेन केरि चिट्ठी लिखति रहैं बचपन मइहा।शुक्लाजी कुछु बोले नाईं। याक दांय अपने लरकिवा क तन देखेन औ फिर अपनी अम्मा तरफ। दादी लरिकवा केरे इ सवाल त भौंचक्किया गईं। शुक्लाजी लरिकवा क बांह पकरे पकरे भीतर चलि दीन्हेनि। कल्लू लपकि क शुक्लाजी की किताबें पकरेनि, टिल्लू क्यार बस्ता उइ उठइयां रहैं लेकिन शुक्लाजी मना कई दीन्हेनि। अब लगै सब लोग दालान तक आ चुके रहैं, टिल्लू खटाखट अपन कपड़ा उतारिक फेंकेन। शुक्लाजी तौलिया लइके टिल्लू क्यार बाल सुखावन लाग। दादी भीतर चली गईं। टिल्लू दूसर कपड़ा पहिनेन औ फिर ते ख्यालै जाएक तैयार। पिताजी तेरे धीरे त पूछेनि, हम तनिक द्यार खेलि आई बाहेर।

द्याखौ बच्चा, कौनो के साथ ख्यालै म कौनौ बुराइ नाई है। बुराई है दूसरेनि केरि गलत बात सीखेम। (फिर शुक्लाजी अपनि आवाज़ तनुकु ऊपर कइकै ब्लावन लाग जेहिते दादी या बात ज़रूर सुनि लें) हमका पूरा भरोसा है तुम ऐस कौनो काम न करिहौ जेहिते दादी क तकलीफ होए।शुक्लाजी अपने लरिकवा क समझा रहे। दादी या बात सुनि लीन्हेनि औ मंदिर म पूजा की बाती संभारति संभारति कुछ बरबरानीं। लेकिन तेहिले टिल्लू अपने पिताजी ते हौसला पाक दुआरे निकरि गे। टिल्लू याक दांय पाछे मुड़ि के देखेनि। शुक्लाजी मुस्कुरान। टिल्लू केरे चेहरौ परते तनाव हटा औ वोऊ मुस्कुरा दीन्हेनि। दादी पूजा क कमरा म कुछ कर रहि रहै तेहिले हे उनके हाथे त तांबा वाला लोटा छुटि क फर्श पर जोर केरि आवाज़ करति भै गिरा, टन्नननननन।

टन्ननननननननन, एकु लोटा लुढ़कति भा आयशा केरे गेट त बाहर गली म आ गा। टिल्लू जौन दौरति भै घर ते निकरे रहे, उनके पाएं तेरे यू लोटा आक टकरान त उइ एकदमै त रुकिगे। टिल्लू अलमूनियम क्यार यू लोटा उठाएन औ आयाशा केरे गेट कि तरफ द्याखन लाग। गेट खुला, वहितै चंदन जैस महकति भै आयशा निकरीं। टिल्लू क देखेन, कहां चलि दीन्ह्यौ छोटे मियां?” टिल्लू सवाल जवाब क मूड म बिल्कुलौ नाई जानि परत हैं, कहूं नाईं ख्यालन जा रहे रहन। तुम एत्ती बड़ी हुइगइ हौ औ तुम ते एकु लोटौ नाईं संभरति?” आयशा क इ लरिकवा तेरे इ बतकही केरि तनिकौ उम्मीद नाई रहै। पिछली दांय यू मिला रहे तौ बाज़ार केरि भगदड़ि मइहां। आजु दुआरे मिला तौ एहिका पारा आसमान पर ऐस जानि परति है। आयशा चुहल केरि कोसिस कीन्हेनि, हाय दइया। बड़े सख्त मिज़ाज मालूम देत हौ छोटे मियां। अल्ला मियां खैर करै कि बड़े नाई हौ, नहीं तौ....

(जारी....)

Friday, October 17, 2008

अलैया बलैया या कि बल्ला उपला

मुंबई
17 अक्टूबर।

आज भोरहरे तेरे खिड़की के पास बइठि क यू सोचित आए कि का वाकई मा ऊई सारी बातै बिला जइहैं, जिनका देखि के हम पंचे बड़े भएन। काल्हि मुंबई म बहुत गर्मी रहै, टेंपरेचर 37 डिग्री के आसपास रहै। शाम क तनुक मौसम जुड़ान तो हम कहा कि चलौ थोड़ी द्यार टहिल लीन जाए। टहलत टहलत बड़ी देर हुइगै और तेहिलेहे हमार याके संगी होनै आईगे। खाना खाएक वक्त हुइगा रहै तो हम पंचै चले गेन पास क याक रेस्टोरेंट मइहां।

बात चलि परी दिल्ली ते शुरू भै हिंदी अख़बार नई दुनिया केरि। एहि की संडे मैगज़ीन में एकु लेख होली क्यारो छपा रहै। एहिका हिंदी क्यार याके बड़े लेखक लिखा हइन। ऊ लेख म पंडित जी लिखेन कि उई होली में अलैया बलैया डारै जात रहैं बचपन मा। और या बात उनका अबहूं याद है। होली जलावे के बाद और अगिले दिन होली मनावे क किस्सौ ऊई बहुत विस्तार तेरे लिखेन। हम अपने साथी त यौ पूछा कि अच्छा बताओ अलैया बलैया होली म डारी जाती हैं कि दीवाली म। ऊई भौचिकिया गे। कहै लाग हां अलैया बलैया डारी जाती हैं, हमहूं गे हन डारै। लेकिन हम कहा सवाल क चकरघिन्नी ना बनाओ, यू बताओ कि अलैया बलैया होरी म डारी जाती हैं कि दीवाली म। ऊई कहै लाग अरे अलैया बलैया वहै ना जेहिम उपला वुपला डारे जात हैं। हम कहा सनई जानत हौ। तनिक द्यार तक ऊई सोचेन फिर कहै लाग कि हां वा सफेद वाली रस्सी जेहिते खटिया कि अरदवाइन कसी जाति है। हम कहा खूब पहिचान्यौ। तो हम पूछा कि या सनई की रस्सी बनति कइसे है, ऊई कहै लाग कि अरे बिरवा में सफेद सफेद रेशा निकरत हैं, वही त रस्सी बनत है। हम कहा सरऊ सफेद रेसा बनै ते पहिले औरौ बहुत पापड़ बेलाई होति है। पहिले सनई के बिरवा जौन अर्हा के बेरवा के एत्ते लंबे लंबे होत हैं उनका काटि के गट्ठर बनाए जात हैं। फिर ई गट्ठर गांव के कौनो ताल तलैया म डारे जात हैं। भैया बोले- हां साफ करै खातिर। हम बतावा- कि साफ करै खातिर नाई, सरऊ सड़ावै खातिर।

जब सनई के बेरवा क्यार तना पत्ता सब दस पंद्रा दिन मा गलि जात हैं तो गट्ठर सूखै खातिर धूम म डारि दीन जाति हैं। फिर बेरवा केरि छाल सनई बन जाति है और वहिके तना केरि लकड़ी ईंधन केरे काम आवित है। एहिकौ सरसों के सूखे बेरवा की नाईं पिंजी कहा जाति है। हुई सकत है यूं नांव पिंजर तेरे बना होए। तो सनई की पिंजी क्यार छोट छोट गट्ठर बनाएक वहिंमा थ्वारा मकहरा (मकई क्यार सूख पौधा) बांधा जाति है। बांधे खातिर खटिया बिने तेरे बचिगा बान इस्तेमाल कीन जाति है। और यू जौन बनकि तैयार होति है वा है अलैया बलैया। और अलैया बलैया होरी म नाई बल्कि दीवाली म जलाई जाती हैं। बरसात के बाद घर की साफ सफाई त बचा कचरा गांव के बाहर जलावै की परंपरा बाद म सायद रस्मी बनिगै और अलैया बलैया वही क रूप है। होली म जौन चीज़ जलाई जाति है वहिका कहत है बल्ला उपला। ई गोबर तेरे बनत है। छोट छोट उपलन केरि बान तेरे माला बनाई जाति है और फिर ई माला लइके हम पंचौ जाइत रहै गांव के बाहर होली जलावै। हमार साथी बड़ी द्यार तक हमरी तरफ द्याखत रहे, उनके कुछ समझि आवा औ कुछ ऊई समझेक ड्रामा करत रहै। तो हम कहा कि संडे नई दुनिया क्यार ऊ अंक म हमरे दिल्ली वाले घर मा धरा है। अगली दांय जइबै तो लेते अइबे। हिंदी के तमाम धाकड़ कहै जाए वाले पुरान लेखक यू समझत हैं कि लोक परंपरा आज क्यार लोग बिल्कुल भुला गे हैं तो ऊई जो कुछ लिखि द्याहैं ऊ ब्रह्मा क वाक्य हुई जाई। अइस है नाई पंडित जी। अलैया बलैया अऊऱ बल्ला उपला म बहुत फर्क है और यू फर्क कम ते कम हमका त अबहूं याद है। आगे आवै वाली पीढ़ी क यू याद रही कि नाई पता नाई। नागर साहब तनुक हल्का हाथ धरौ।

कहा सुना माफ़,

पंकज शुक्ल